राजकुमारियों की कहानी

यह राजकुमारियों की कहानी है जिन्हे युवराज की पत्नी बनने की परीक्षा के लिए बुलाया गया है। आइये देखते कि कोनसी राजकुमारी का चयन किया जायेगा। 

सिंहगढ़ एक बहुत ही सुखद राज्य था। जहाँ की प्रजा राजा जयवीर सिंह और रानी रूपवती की बहुत तारीफ किया करती थी। लेकिन फिर भी जनता के सबसे चहीते थे राजकुमार रघुवीर सिंह और क्यों ना हो राजकुमार थे भी वैसे। वो बचपन से ही हर कला में निपुण थे। महाराज अपने बेटे को शष्त्र चलाना सिखाते थे, और दूसरी और महारानी अपने बेटे को वेदों का ज्ञान देती थी।

राजकुमारियों की कहानी
राजकुमारियों की कहानी

महारानी :- इंसान का सबसे बड़ा और सबसे पहला फ़र्ज़ है इंसानियत। उसके दिल में दया, करुणा और प्रेम की भावना भरपूर होनी चाहिए।

युवराज रघुवीर सिंह अपनी माता की हर बात को अच्छे से समझते थे। समय के साथ युवराज एक शक्तिशाली युवक बन गए। उनका शास्त्रों का ज्ञान भी प्रशंशाजनक था। सटीक निशाना, फुर्तीली तलवारबाज़ी सब बहुत ही प्रश्नशाजनक था।

राजा :- रानी, अब युवराज राजा बनने के योग्य बन गए है।

रानी :- हां, और अब उनकी अध्यात्मिक शिक्षा भी सम्पंन हो गयी है।

राजा :- तो देर किस बात की।

राजा सबको बुलाता है और एलान करता है कि :-

राजा :- हमे बहुत ख़ुशी हो रही है आप सब को यह बताने में कि हमारे बेटे युवराज रघुवीर अब इस लायक हो गए है कि वो हमारी गद्दी संभाले। हम ये एलान करते है कि आज से 6 माह बाद युवराज रघुवीर सिंह राजा रघुवीर सिंह बन जायेंगे। एक और बात युवराज का राजतिलक होने से पहले उनके विवाह की शहनाई पुरे राज्य में गूँजेगी।

इस एलान के बाद युवराज रघुवीर के लिए अलग-अलग राज्यों से राजकुमारियों के रिश्ते आने लगे।

रानी :- इतनी सारी राजकुमारिया।

राजा :- आखिर किसे तुम्हारी रानी बनाये ?

राजकुमार :- ये तो बहुत सरल है माँ। आप सभी राजकुमारियों को यहाँ बुलाइये और उनकी परीक्षा लीजिए और जो उनमे से आपको भा जाये उसे ही रानी बना दीजिये।

रानी :- सुझाव तो बहुत अच्छा है। महाराज सभी राजकुमारियों को महल में आने का निमंत्रण दीजिये। मैं खुद उन सबकी परीक्षा लुंगी।

राजा :- हम्म! ठीक है।

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कुछ दिनों बाद एक-एक करके पाँच राजकुमारियाँ दरबार में पधारी। सभी राजकुमारियों ने राजा और युवराज को प्रणाम किया।

राजा :- आप सभी का हमारे महल में स्वागत है। आप लोग रानी महल की तरफ प्रस्थान कीजिये। वहाँ रानी माँ आपका इंतज़ार कर रही है।

पाँचो राजकुमारियाँ रानी महल की तरफ चलने लगी।

पहली राजकुमारी :- क्या किसी को पता है कि रानी माँ क्या परीक्षा लेंगी ?

दूसरी राजकुमारी :- नहीं। शायद वो हमसे खाना बनवाये।

तीसरी राजकुमारी :- या कोई पेचीदा सवाल पूछे।

चौथी राजकुमारी :- वो हमे शास्त्र कला में भी परख़ सकती है।

रास्ते भर चारो राजकुमारिया बड-बड कर रही थी लेकिन राजकुमारी इंदिरा शांत थी। वो आस-पास के वातावरण को देख रही थी। उन्हें रंग-बिरंगे फूल बहुत अच्छे लगे। आखिर पाँचों राजकुमारिया रानी महल पहुँची लेकिन वहाँ रानी कोई और ही थी और रानी रूपवती ने एक दासी का रूप लिया था।

दासी :- हम आप सभी का स्वागत करते है। हमे ख़ुशी है कि आप यहाँ पर आयी। महारानी थोड़ी-ही देर में पधारेंगी। तब-तक मैं आपके लिए शरबत लाती हुँ।

वो सब राजकुमारियाँ महल निहारने लगी और रानी रूपवती जो दासी के बेस में थी वो उन सब राजकुमारियों को निहारते हुए वहाँ से चली गयी। थोड़ी ही देर में वो सब एक-दूसरे से बाते करने लगी। देखते ही देखते 2 घंटे बीत गए।

पहली राजकुमारी :- रानी माँ अब तक लोटी नहीं।

दूसरी राजकुमारी :- कहीं व्यस्त हो गयी होंगी। जल्द ही वापिस आएँगी।

उन सभी ने अपनी गप-शप जारी रखी। लेकिन राजकुमारी इंदिरा अपने-आप में ही मशरूफ थी। सुबह से शाम हो गयी।

पहली राजकुमारी :- लगता है रानी माँ हमे भूल गयी।

दूसरी राजकुमारी :- क्या हमे यहाँ अपनी बेज़्ज़ती करने के लिए बुलाया है ?

तीसरी राजकुमारी :- इतना गुस्सा मत करो। शायद वो हमारी परीक्षा लेने की तैयारी कर रही हो।

तभी दासी बनी हुई रानी फिर वहा आयी।

दासी :- रानी माँ ने आप सभी के लिए एक सन्देश भेजा है।

राजकुमारियों की कहानी
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ये सुन कर सभी राजकुमारियाँ दासी के पास चली गयी।

दासी :- उन्होंने कहाँ है कि मैं आप सब को यह शरबत पिलाऊ। तब तक आप उनका इंतज़ार कीजिये।

इंदिरा को छोड़-कर सभी राजकुमारियाँ दासी को घूरने लगी और दासी के रूप में आयी रानी ने जान-बुझ कर वो शरबत सभी राजकुमारियों के कपड़ो पर गिरा दिया।

पहली राजकुमारी :- अरे!

दूसरी राजकुमारी :- अंधी हो क्या ?

तीसरी राजकुमारी :- दासी हो कर काम करना भी नहीं आता।

चौथी राजकुमारी :- मेरी इतनी महंगी ड्रेस खराब कर दी। अब तुम गयी काम से।

मनसा दासी की और बढ़ ही रही थी कि इंदिरा बिच में आ गयी।

इंदिरा :- रुक जाओ मनसा। उन्होंने यह जान-बुझ कर नहीं किया। गलती से हुआ होगा।

मनसा :- तुम्हारी ड्रेस महंगी नहीं है इसलिए। अब मैं रानी माँ के सामने परीक्षा कैसे दूंगी। मैं इस दासी को तो नहीं छोडूंगी।

दूसरी राजकुमारी :- ना जाने रानी माँ ने कैसी दासी रखी है।

तीसरी राजकुमारी :- जैसी रानी, वैसी दासी।

इंदिरा :- तुम सब इतनी छोटी-सी बात पर इतना अनाप-शनाप क्यों बोल रही हो ?

दूसरी राजकुमारी :- तुम तो चुप ही बैठो। इतने घंटो से हमे यहाँ बैठा कर ये रानी हमारी बेज़्ज़ती कर रही है। समझ नहीं आता कोनसी परीक्षा के लिए बुलाया है।

दासी :- वहीं परीक्षा जो तुम हार चुकी हो। परीक्षा खत्म हुई और परीक्षा केवल राजकुमारी इंदिरा ने पार की। तुम सब-की-सब बहुत सुन्दर हो लेकिन रानी बनने के लिए दिल भी बड़ा चाहिए सिर्फ सौंदर्य नहीं। मैं रानी रूपवती हुँ और मैंने अपनी बहु चुन ली है। राजकुमारी इंदिरा बनेगी मेरे बेटे रघुवीर सिंह की पत्नी। आप सब अपने-अपने घर वापिस जा सकती है।

चारो राजकुमारियों का मुँह छोटा हो गया और वो वहाँ से चली गयी। रानी रूपवती ने अपनी होने वाली बहु को सोने का हार पहनाया और अपनी बहु के साथ ढेर सरे तोहफे भी भेजे। 2 महीने बाद युवराज रघुवीर सिंह और राजकुमारी इंदिरा का विवाह हो गया और विवाह के 4 महीने बाद युवराज को राजा बना दिया गया और युवरानी इंदिरा बन गयी रानी इंदिरा। राजा रघुवीर सिंह और रानी इंदिरा को पा कर उनकी प्रजा बहुत खुश थी क्योकि वो दोनों राजा जयवीर सिंह और रानी रूपवती के प्रतिबिंम्ब थे।

इसीलिए दोस्तों कहते है की इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

कहानी की सीख :- इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

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