मैं कौन हूं | Who Am I

मैं’ यानी कि आपका हमारा self जिसे अहं भाव व अहंकार भी कहा जाता है। जिससे खुद के होने का आत्मबोध या अहसास होता है। आखिर ये मैं कौन है? या मैं कौन हूं क्या मैं सच में होता है? मैं को कैसे समझें? वास्तविक रूप में आत्मबोध कैसे हो?

आज आप इस मैं के रोचक और गहरे रहस्यों को बारीकी से जानने वाले हैं।
तो इस क्रम में सबसे पहले संक्षेप में मनुष्य जीवन को प्रभावित करने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक पहलुओं को इस मैं कौन हूं के संदर्भ में आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझते हैं।

शरीर(Body) मैं(I, Self) नहीं है

हमारा एक शरीर है। जो हमारे द्वारा अब तक खाये गए खाद्य पदार्थों का परिवर्तित रूप ही है। असल मैं हम जो भी खाते हैं वही हमारा शरीर बन जाता है। शरीर का अधिकांश हिस्सा पानी है और बाकी हिस्सा कुछ अन्य ठोस व गैसीय पदार्थ हैं।

जो हमारे शरीर के रूप में जीवन पर्यन्त हमारे साथ रहते हैं। और फिर वापस परिवर्तित होकर प्रकति में मिल जाते हैं। इस प्रकार ये कहना उचित ही होगा की कुछ पदार्थ जो हमसे जुड़कर हमे एक ढांचा प्रदान करते हैं वह हमारा शरीर है।

ओर शरीर मैं नहीं हो सकता क्योंकि जो शरीर आज है वो बचपन में नही था भविष्य में भी नहीं रहेगा। पर मैं बचपन, युवावस्था ओर बुढ़ापे में भी रहता है।
अतः श्पष्ट है कि शरीर मैं नहीं है। ओर शरीर के होने के कारण शरीर का मैं होने का अहसास मात्र भ्रम है।

दिमाग(Brain) के कारण ‘मैं कोई हूँ’ का आभास होता है

हम मनुष्यों का दिमाग एक ऐसी मशीन है जिसका काम हमारे साथ ओर हमारे आसपास की अलग अलग वस्तुओं और घटनाओं को जमा करके रखना है।

जब हमें जरूरत हो तब हमें भूतकाल की जमा की गई इन सूचनाओं को याद दिलाना व भविष्य के लिए विश्लेषण कर कार्य परिणाम का अनुमान लगाना भी दिमाग की ही जिम्मेदारी है।

दिमाग का आधारभूत काम हर परिस्थिति में हमें जीवित ओर सुरक्षित रखना है। इसके लिए दिमाग अपने अनुभवों सूचनाओं ओर बुद्धिमत्ता की मदद से समय समय पर कुछ युक्तियां सुझाता रहता है। साथ ही दिमाग के नियंत्रण के कारण ही शरीर के सभी अंग कार्य करते हैं।

दिमाग हर कार्य के लिए एक विचार(Thought) उत्पन्न करता है।
मानव मस्तिष्क की इन सभी गतिविधियों के कारण मैं का आभास हमेशा बना रहता है। इस आभास को बने रहने के लिए विचारों (Thoughts) की जरूरत होती है। जो लगातार चलते रहते हैं। विचारों का रुक जाना लगभग असंभव है, यहाँ तक कि नींद में भी।

ओर विचारों को रोकने की हर कोशिश अपने आप मे एक नया विचार ही है।
इसका अर्थ ये हुआ कि मैं शरीर में भी नहीं है। और मैं विचार में भी नहीं है। क्योंकि विचारों का आना भूतकाल की घटनाओं और भविष्य के अनुमानों से सम्बंधित है। जो कि वर्तमान की स्थिति के संदर्भ में सत्य नहीं है।

मैं के आभास में मन(Mind) की भूमिका

मन से भावनाओं का उद्गम होता है। और लगभग हर अच्छी बुरी भावनाओं में मस्तिष्क ओर बुद्धि द्वारा इकट्ठा किये गए ज्ञान(जो कि सूचनाओं के संग्रह के अतिरिक्त कुछ भी नहीं) का अंश मिल जाता है। जिस कारण मुख्यतः कुछ भावनाओं से खुशी मिलती है और कुछ से दुख।

गहराई से देखा जाय तो मन में अलग अलग प्रकार की भावनाओं का आना शरीर और जीवन यापन के लिए अति आवश्यक है।लेकिन दिमाग और बुद्धि के हस्तक्षेप के कारण हर भावना अपने सच्चे रूप में उजागर नहीं होती। साथ ही अधिकतर भावनाएं मैं के आभास के कारण ही उत्पन्न होती हैं।

यहाँ तक समझा जा सकता है कि मन मस्तिष्क बुद्धि निरंतर अपना काम कर रहे हैं। इन सभी कामों को देखने समझने जानने वाला छद्म अहसास ‘मैं’ है। अब इस मैं के जानने को जरा ठीक से समझते हैं।

मैं जो भी देखता सुनता जानता है झूठ है।

हम किसी वस्तु या घटना को मन मस्तिष्क बुध्दि में इकट्ठा की हुई सूचनाओं के अनुसार दृटिकोण बनाकर देखते समझते हैं। इसके साथ साथ अपने अनुभवों के आधार पर विश्लेषण करते है और निष्कर्ष निकालते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि आप किसी भी चीज को पूरी सत्यता से कभी देख सुन समझ ही नहीं सकते।

उदाहरण के लिए पानी। पानी को सब जानते हैं।
विज्ञान में बहुत सी जानकारी और शोध आदि के कारण हमें लगता है कि पानी से हम वाकिफ हैं। पर उस वस्तु को पानी नाम देने का कार्य मस्तिष्क और विचारों का है।

जो तर्क संगत नहीं है। जैसे आपका नाम आपकी असलियत कभी नहीं हो सकता क्योंकि आपका नाम बस कुछ अक्षरों का संयोजन है या पहचान का प्रतीक।

पानी को हम अनुभव करते हैं पर पानी को अनुभव करने के अनुभव में भी विचारों और संकलित जानकारियों के हस्तक्षेप के कारण ये अनुभव भी वास्तविक नहीं रह पाता।
इसको ऐसे समझें कि एक व्यक्ति जो बहुत प्यासा रहने के बाद पानी पीता है। उसके पानी के बारे में अलग अनुभव होंगे।
दूसरा व्यक्ति जो पानी मे डूबते डूबते मुश्किल से जीवित बचा होगा। उसके पानी के बारे में अपने अनुभव होंगे।

अब जब ये दोनों लोग एक साथ एक ही पानी पियें तो पानी के साथ इनका अनुभव अलग होगा। पानी के बारे में इनका ज्ञान भी अलग होगा।

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अर्थात एक ही वस्तु के लिए सबके मैं का अलग दृष्टिकोण होता है। जबकि ऐसा होना ही नहीं चाहिए। इसी से साफ जाहिर है कि हमारा जानना सुनना समझना आदि सब आंशिक रूप से भी सत्य नहीं हैं।

दरअसल हर एक चीज का नाम किसी न किसी इंसान ने रखा है यानी दिमाग ने। यहाँ तक कि भगवान का नाम भी इंसान ने रखा है। वास्तव में हम जानते ही नहीं कोई चीज क्या है।
अगर हम किसी चीज को पेड़ कह रहै हैं या फूल कह रहै हैं तो वो न तो पेड़ है न फूल है। तो क्या पेडों को ओर फूलों को बनाने वाले को ये पता होगा?

क्या सच मे किसी ने बनाया होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा दिमाग सोचता हो कि हर चीज किसीने बनायी है। जबकि असलियत में में ‘बनाना’ ओर ‘बनाने वाला’ जैसे विचारों का आना सिर्फ दिमाग के सोचने के तरीके और क्षमता के कारण ही होता हो।

इसका अर्थ हुआ कि हम किसी वस्तु अथवा घटना को उसी रूप में देखते समझते हैं जिस रूप में हमने अपने मैं के स्वरूप को खड़ा किया है।
ओर ये हम अच्छी तरह समझ चुके हैं कि मैं का आभास लगातार चलते विचारों के कारण होता है। जो सत्य नहीं है।

अगर विचार नहीं होंगे तो मैं नहीं होगा।

किसी तरह अगर एक पल के लिए भी हमारे विचार पूरी तरह से रुक जाते हैं। तब हम समय काल से परे हो जाते हैं ओर तब इस पूरे ब्रह्मांड में ओर हम में रत्ती भर भी अलगाव नहीं रहता। और तब हमें पहली बार मैं के झूठे स्वरूप का बोध होता है। इसी से मैं कौन हूं का एक छ्द्म ज्ञान होता है जो वास्तविकता में सत्य नहीं है।

मैं कौन हूं को जानना कुछ ऐसा है जैसे सपने में ही समझ लेना कि ये सपना है। और सपने में ही समझ लेना कि अगर ये सपना है तो सच क्या है।
ये जान लेने पर फिर एक वास्तविक मैं का बोध होता है। जो बस एक ही है और उस एक मैं के सिवा इस ब्रह्मांड में ओर कुछ भी नहीं है। इस अकथनीय व अवर्णनीय अवस्था को जानने वाले एक ओंकार सतनाम, ॐ, सत्य, परमात्मा, परमानन्द, अनहद नाद या अनाहत नाद, परमज्ञान, ईश्वर दर्शन आदि अनेक नामों से व्यक्त करने का प्रयास करते है।

विचारों का होना कब खत्म होता है?

विचारों का खत्म होने का अर्थ मैं की मृत्यु है या मस्तिष्क का मर जाना है। ये कहना उचित होगा कि किसी भी प्राणी या वस्तु की कभी भी मृत्यु नहीं होती है। वस्तुओं का स्वरूप परिवर्तन होता है और प्राणियों के ‘मैं’ या मैं कौन हूं के झूठे अहसास की मृत्यु होती है।
पर कुछ व्यक्तियों के जीवन में ऐसे बोध हो जाते है। जिससे उन्हें मैं के अहसास की पूर्ण समझ हो जाती है। और तब वे व्यक्ति हर एक वस्तु ओर प्राणी का सत्य बस एक पल में ही जान जाते हैं।

विचारों को खत्म करने की कोई तकनीक नहीं है। पर यदि ऐसा हो जाता है कि आप पूरी तरह से जाग्रत भी हों और विचारशून्य भी हो जायें तब आप समय स्थान(Time & Space) से बाहर निकल जाते हो। और तब आप वो नहीं रह सकते जो अभी तक थे।

क्योंकि तब आप जानते हो कि मैं कौन हूं साथ ही यह भी जानते हैं कि मैं कहीं हूँ ही नहीं। ओर जो हर जगह हर तरफ है वो भी मैं ही हूँ। ये बात विरोधाभासी लगती है पर शब्दों की यही सीमा है।
मैं का सत्य शब्दों से समझना और समझाना भी मैं की सामर्थ्य पर ही निर्भर है जिसका आधार मिथ्यापूर्ण ज्ञान और झूठे विचार हैं।

क्या ध्यान साधना से मैं कौन हूं का आत्मबोध हो सकता है?

ध्यान साधना करने से या तो नींद में जाया जा सकता है। या ध्यान साधना करने वाले को ये अहसास हो सकता है कि वह विचारशून्य हो रहा है।
पर जैसे ही उसे लग रहा है कि वह विचारशून्य हो रहा है उसका ये अहसास ही एक विचार के रूप में उससे छल कर रहा होता है। और ये उसके मैं के ही कारण है।
कुछ भी कर के विचारशून्य होने की कोशिश ही विचार है। और हर एक कार्य विचार के कारण ही हो रहा है। अर्थात जब तक कुछ हो रहा है तबतक विचार होंगे ही।

क्या दिव्य अनुभव विचारशून्यता के कारण होते हैं?

कोई भी अनुभव मन मस्तिष्क की कार्यप्रणाली तथा बौद्धिक ओर भावनात्मक जाल का परिणाम है। मन मस्तिष्क के प्रभावों में फेरबदल कर अनगिनत अनुभव किये या करवाये जा सकते हैं। पर इन सभी अनुभवों में मैं कौन हूं का झूठा आभास हमेशा बरकरार रहता है। अर्थात ये सभी अनुभव झूठ होते हैं। क्योंकि हर एक अनुभव को करने वाला मैं ही है।

मैं कौन हूँ के आत्मबोध पर अंतिम निष्कर्ष

मैं झूठ है। मैं ब्रह्मांड से अलगाव का एक आभास मात्र है। मन मस्तिष्क बुद्धि पर शोध के जरिये विज्ञान, मनोविज्ञान ओर आध्यात्मिक ज्ञान की सहायता से ये समझा जा सकता है कि मैं कौन हूं या मैं कोन नहीं अथवा क्या नहीं हूँ।

पर मैं का वास्तविक स्वरूप जो समस्त ब्रह्मांड में एकरसता ओर एकरूपता से व्याप्त है। जो एक चींटी के मैं से एक हाथी के मैं तक मे एक जैसा है। उस स्वरूप का बोध अर्थात मैं कौन हूं का आत्मबोध करने की कोई युक्ति नहीं है।

फिर भी विवेक और प्रज्ञापूर्वक उन सभी कारकों को निरंतर अलग हटाया जाए जो मैं नहीं है। तो शायद अंत मे जो शेष रहे वो कुछ बोध करवा सकता है और मैं के सभी मिथ्यापूर्ण स्वरूपों का सत्य सामने ला सकता है।

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